तबीअत !!

कभी इस कदर बेज़ार तबीअत नहीं रही !

कभी ज़िन्दगी इस कदर बेमुरव्वत नहीं रही !!

 

रात भी कटती नहीं और दिन भी गुज़रता नहीं !

शायद वक़्त की रफ़्तार में वो शिद्दत नहीं रही !!

 

वो शख़्स है जो आईने में आजकल खामोश है !

शायद ख़ुद से बात करने की अब आदत नहीं रही !!

 

अब कुछ वक़्त मिला है तो परेशान हो गए !

आज तक इतनी कभी फुरसत नहीं रही !!

 

इक अजनबी से हो गए वो चन्द ऱोज़ में !

मिलते तो हैं पर वो हरारत नहीं नहीं रही !!

 

चेहरे से जान लेते हैं वो मेरे दिल का हाल !

अब झूठ बोलने में वो महारत नहीं रही !!

 

अब दिल का हाल आपको क्यों करके सुनाएँ !

जो आपको अब हमसे मोहब्बत नहीं रही !!

 

है किस तरह का ये मंज़र ये कैसा शहर है !

कहने को लोग तो हैं रफ़ाक़त नहीं रही !!


हरारत : warmth

रफ़ाक़त : friendship, companionship

कारवाँ !!

मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने कहा था :

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

 
मजरूह सुल्तानपुरी जी से माफ़ी माँगते हुए बड़े अदब के साथ कहना चाहता हूँ :

कारवाँ ले कर चला था जानिब-ए-मंज़िल मग़र

लोग छूटते गए और आख़िर मैं अकेला रह गया !

जेहाद !!

Feel so pained and ANGRY..

Merciless killing of our soldiers by a lunatic in name of Jehad and Jannat. Cant help but say this to them and their supporters: ROT ETERNALLY IN HELL..

जेहाद के नाम पर ये खून बहाने वाले

कैसी है इनकी वहशत, ये कैसा जूनून है?

 

जन्नत के नाम पर मासूमों के ये क़ातिल ,

सर पे जिनके जाने कितनों का खून है !

 

फुर्सत मिले तो जा कर के ज़रा इनसे पूछना ,

दोज़ख़ में उनकी रूह को कितना सुकून है !!

रौशनी !!

मैं अंधेरों उजालों में तुझको ढूंढ़ता हूँ,

आवाज़ दे मुझे तू ए ज़िन्दगी कहाँ है !

तारीकियों में डूबी हर एक शै है जैसे ,

चराग़ तो रोशन है मग़र रौशनी कहाँ है !!

 

रंजिश !!

ख़ुद की भी ना रहे ख़बर , यों बेहोश हो जाएं ,

चलो मयखाने में जा कर ज़रा मदहोश हो जाएं !

यों लड़ते लड़ते थक चुके, अब छोड़ कर रंजिश ,

चलो मयखाने में जा कर के फिर से दोस्त हो जाएं !!

अहदे-रफ्तां !!

दिले हज़ीं में जिनका तस्सवुर है अभी तलक,

भूले से ही सही वो हमें याद तो करते होंगे !

 

पलकों में जो मस्तूर हैं अश्क़ दिले ज़ार के,

बन के गरदाब उनकी आँखों से गुज़रते होंगे !

 

चर्ख पर चमकते इस माहताब के तले,

हम सिसकते हैं तो वो भी तो जलते होंगे !

 

आती तो होगी याद उनको अहदे रफ्तां की,

बन संवर के जब वो घर से निकलते होंगे !

 

तर्के उल्फ़त से वो लगते हैं मुतमइन लेकिन,

ज़ुल्मते शब वो यकीनन पहलू तो बदलते होंगे

तुम !!

कोई भी हो मंज़र, मुझे बस तुम ही दिखते हो,,
नज़र ऐसी मेरी उलझी तेरी नज़रों से जा लिपटी !

कोई भी बात करता हूँ, तेरी ही बात होती है,
कोई भी बात जो निकली तेरी बातों से जा लिपटी !

मैं तुझको याद करता हूँ, तेरा ही नाम लेता हूँ ,
मेरी सांसों की हर जुम्बिश तेरी सांसों से जा लिपटी !

कोई भी ख्वाब हो मेरा, तेरा ही ख्वाब होता है ,
मेरे ख्वाबों ही कहानी तेरे ख्वाबों से जा लिपटी !

कोई भी साथ हो मेरे, तेरे ही साथ चलता हूँ ,
मेरे क़दमों की हर आहट तेरे क़दमों से जा लिपटी !

 

वाइज़ !!

मयखाने से निकला ही था के मिल गया वाइज़ मुझे,

कहने लगा मैं देखता हूँ रोज़ आते हो यहाँ

कुछ होश की दवा करो क्या मिल रहा पी कर तुम्हेँ ,

ये आदत बहुत ख़राब है शराब छोड़ दो !!

 

मैंने कहा अदब से मेहरबानी मोहतरम ,

आपको अब क्या कहें जिसने कभी पी ही नहीं

मयखाने को रखने दो मेरे जाम का हिसाब,

जा कर ख़ुदा का नाम लो, हिसाब छोड़ दो !