अंधेरों में रहने की आदत सी हो चली है
ये रात ना गुज़रे कभी, ना आफ़ताब निकले
हो जाएगा नुमायाँ ये मेरा जिस्म बरहना
है इल्तजा तुझसे ख़ुदा ये बर्फ ना पिघले !! Continue reading
अंधेरों में रहने की आदत सी हो चली है
ये रात ना गुज़रे कभी, ना आफ़ताब निकले
हो जाएगा नुमायाँ ये मेरा जिस्म बरहना
है इल्तजा तुझसे ख़ुदा ये बर्फ ना पिघले !! Continue reading
तूफ़ान कुछ ऐसा चला, गुलशन को ख़ाक कर गया ,
हम रह गए बस बिखरे हुए तिनके सँभालते !
लफ़्ज़ों के नश्तर छोड़ कर वो अपनी राह चल दिया
हम रह गए बस जिस्म से काँटे निकलते !!
ऐसा नहीं कि दर्द को सहने की ताब है
महसूस कुछ होता नहीं, एहसास ग़ुम !
अब क्या कहूँ मैं उनसे अपनी मज़बूरी
वो सामने जब भी रहे , आवाज़ गुम !
जज़्बात को लफ़्ज़ों की देने लगा शक्ल
जब हाथ में आई क़लम, अल्फ़ाज़ ग़ुम !
तू बता इस हाल में कैसे कहूँ ग़ज़ल
मय भी है, महफ़िल भी है, साज़ ग़ुम !
वो संग बरसाते रहे हो कर पसे पर्दा,
पास उनके और कोई रास्ता शायद न था !
पीठ में पैवस्त खंजर ये गवाही दे रहे ,
सामने आने का उनमें हौसला शायद न था !
संग (पत्थर) , पसे पर्दा (परदे के पीछे से)
जिस से भी नज़र मिली, क़तरा के चल दिया,
बेवज़ह मुस्कुराने की ज़रुरत ही कहाँ है !
बेसुध है मेरे शहर का निज़ाम जब सारा,
फ़िर होश में आने की ज़रुरत ही कहाँ है !
एक दिन महबूब से कुछ हमने यों पूछा ,
बतलाओ आख़िर कैसा किस्सा है मुहब्बत !
वो हंस पड़े और बोले ए सनम हमपे ,
मरते भी हो और पूछते हो क्या है मुहब्बत !
बाग़ में इक फूल का खिलना है मोहब्बत ,
सुबह को चिड़िओं का चहकना है मोहब्बत ,
शमा पे परवाने का यों मरना है मोहब्बत ,
यों इस तरह तेरा मेरा मिलना है मोहब्बत ,
नादान हो कितने जो तुम ये जानते नहीं ,
खुद को लुटा देने का जज़्बा है मोहब्बत !
माहताब का शब को निकलना है मोहब्बत ,
मौसम का यों रंग बदलना है मोहब्बत ,
बेकरार दिल का मचलना है मोहब्बत ,
हाथों में ले के हाथ चलना है मोहब्बत ,
और तो अब क्या कहें बस जान लो इतना ,
बस यही इक लफ्ज़ सच्चा है मोहब्बत !
तू मेरे पास होता, ये मेरी हालत नहीं होती,
यों पीकर बहकने की फिर ज़रुरत नहीं होती !
फ़िर जाम उठाने का वक़्त कहाँ मिलता ,
जब गेसुए पेचां से ही फुर्सत नहीं मिलती !
कटती है सुब्होशाम मयखाने में आज कल ,
जो तू होता यक़ीनन ये मेरी आदत नहीं होती !