इल्तजा !!

अंधेरों में रहने की आदत सी हो चली है

ये रात ना गुज़रे कभी, ना आफ़ताब निकले

हो जाएगा नुमायाँ ये मेरा जिस्म बरहना

है इल्तजा तुझसे ख़ुदा ये बर्फ ना पिघले !!

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