मुड़ मुड़ शामां पैंदीआं ने , मुड़ मुड़ ओ तन्हाई ऐ ,
मैं आपे गल्लाँ करदा हाँ, मैनू कैंदे लोग शदाई ऐ !
मुड़ मुड़ यादाँ आँदियां ने, कदी चेता ओदा भुलदा नईं,
ओ नाल नई पर दूर वी नई, मेरा यार बड़ा हरजाई ऐ !!
मुड़ मुड़ शामां पैंदीआं ने , मुड़ मुड़ ओ तन्हाई ऐ ,
मैं आपे गल्लाँ करदा हाँ, मैनू कैंदे लोग शदाई ऐ !
मुड़ मुड़ यादाँ आँदियां ने, कदी चेता ओदा भुलदा नईं,
ओ नाल नई पर दूर वी नई, मेरा यार बड़ा हरजाई ऐ !!
हैं मजबूत इरादे बिना तामील के बेमानी,
कागज़ की कश्ती पर समंदर पार नहीं होते !
बिना कोशिश बस ख्वाब में मिलती है मंज़िल ,
बिना गिरे तो शहसवार भी तैयार नहीं होते !
लफ़्ज़ों में लिपटा दर्द ना हो जाए बरहना,
तुम सामने हो तो कहीं कुछ बात ना निकले !
तन्हाईओं में अक्सर करते थे इस से बातें ,
डरते है ये आईना कहीं गुस्ताख़ ना निकले !!
आदत मेरी ख़राब के सच बोलता हूँ मैं !
कहते हैं पागल मुझे तेरे शहर के लोग !
ना ये ख़याल रख कि मुझसे जुदा है तू ,
मुझपे उठा सवाल तो तेरी भी बात होगी !
ख़ुलूस से नफ़रत निभाना उनसे कोई सीख ले,
ख़ंजर भी मारते हैं , शिद्दत से गले लग कर !!
वो परेशां हो गए संग बरसाते,
मैंने न कभी उनको पलट कर देखा !
ये मेरी जाँ जिस्म से तब निकली,
मैंने जब तेरे भी हाथ में ख़ंजर देखा !!
अंधेरों में रहने की आदत सी हो चली है
ये रात ना गुज़रे कभी, ना आफ़ताब निकले
हो जाएगा नुमायाँ ये मेरा जिस्म बरहना
है इल्तजा तुझसे ख़ुदा ये बर्फ ना पिघले !! Continue reading
तूफ़ान कुछ ऐसा चला, गुलशन को ख़ाक कर गया ,
हम रह गए बस बिखरे हुए तिनके सँभालते !
लफ़्ज़ों के नश्तर छोड़ कर वो अपनी राह चल दिया
हम रह गए बस जिस्म से काँटे निकलते !!
ऐसा नहीं कि दर्द को सहने की ताब है
महसूस कुछ होता नहीं, एहसास ग़ुम !
अब क्या कहूँ मैं उनसे अपनी मज़बूरी
वो सामने जब भी रहे , आवाज़ गुम !
जज़्बात को लफ़्ज़ों की देने लगा शक्ल
जब हाथ में आई क़लम, अल्फ़ाज़ ग़ुम !
तू बता इस हाल में कैसे कहूँ ग़ज़ल
मय भी है, महफ़िल भी है, साज़ ग़ुम !