कारवाँ !!

मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने कहा था :

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

 
मजरूह सुल्तानपुरी जी से माफ़ी माँगते हुए बड़े अदब के साथ कहना चाहता हूँ :

कारवाँ ले कर चला था जानिब-ए-मंज़िल मग़र

लोग छूटते गए और आख़िर मैं अकेला रह गया !

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